Friday, August 5, 2011

कभी कभी ख्वाबों में जब तुम आती हो,.....

कभी कभी ख्वाबों में
जब तुम आती हो,
इतने सालों के बाद भी |
कभी कभी रातों में 
जब रजनीगंधा 
खिड़की से बाँहें फैलाती है-
और हवा थपकियाँ देती है
हलके हलके से |
सन्नाटे की लोरी,
रात का राग कोई बन जाती है ,
जब तुम आती हो,
इतने सालों के बाद भी | 

ख्वाब कभी शामों के
और कभी सुबहों के |
ख्वाब कभी जन्नत के और
कभी-कभी जंगल के अंधियारों के, 
सन्नाटों के |
जहां तुम हो, मैं हूँ 
और बीच की तन्हाई हैं|

ख्वाब तो मेरे अपने पर नहीं होते हैं,
और सवेरे आँखों में जो किस्से हैं, नहीं होते हैं |
बस होती है एक सुबह सुरीली,
दिन दीवाने होते हैं,
जब तुम आती हो, 
इतने सालों के बाद भी |
कभी कभी.....

6 comments:

  1. बस होती है एक सुबह सुरीली,
    दिन दीवाने होते हैं,

    kya baat hai ..janaab ..

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  2. poem achi h.....bdw i hav a ques.....wo koun h jo baar baar bas aati h aur jaati h......ek hi h ya ek se jyada...hehehe.....;)

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