ऐ खुदा-ए-हुस्न
तेरा आना क़यामत था |
गिरा कर बिजलियाँ सब पर
तेरा जाना क़यामत था ||
कि जुड़वाँ शोले थे सुलगे
शहर में आग फैली थी |
कि दरिया सूख ही जाता
कि ऐसी आग गहरी थी ||
ऐसी आग सुलगा कर
यूँ शर्माना क़यामत था |
और पल में चाँद से शोला
बदल जाना क़यामत था ||
कि दिन में रात को लाती
कमर तक तेरी जुल्फें थीं
अँधेरी रात से काली
नदी सी बहती जैसे थीं |
कि ऐसी जुल्फें लहरा कर
मचल आना क़यामत था |
और जादू कर कोई काला
भुला जाना क़यामत था ||
ऐ खुदा-ए- हुस्न ......
Thursday, April 15, 2010
chaand
वो कहते हैं चले आओ
महीनों बीत जाने हैं
कि छत पर चाँद का आना
कभी देखा नहीं हमने |
कि परसों ईद आनी है
नहीं आने पर
किस मुँह से
हम छत पर चाँद देखेंगे |
महीनों बीत जाने हैं
कि छत पर चाँद का आना
कभी देखा नहीं हमने |
कि परसों ईद आनी है
नहीं आने पर
किस मुँह से
हम छत पर चाँद देखेंगे |
Subscribe to:
Posts (Atom)
पत्नी की कोरोना
साधारण खांसी बुखार जबसे कोरोना निकल गया, मेरी पत्नी जी का तो जैसे मौसम बदल गया | दवाई का डिब्बा, औक्सीमीटर , थर्मोमीटर सर्वदा साथ हैं बी...
-
मेरी सबसे पहली कविताओं में से एक जो मैंने शायद २००२ में लिखी थी |आज के समय के हिसाब से थोड़े-बहुत परिवर्तन किये हैं | एक मध्यम-वर्गीय लड़के ...
-
सारी दुनिया से बातें कर ली तुमसे बात नहीं की तो सब कुछ खाली लगता है । सब के साथ हंसा किया और सब के साथ जाने कितने चुटकुले सुने-सुना...
-
श्री हरिवंश राय बच्चन जी की मधुशाला से प्रेरणा ले कर मैंने ये पंक्तियाँ तब लिखीं थी जब मैं 10th कक्षा में था | आज तक उनके जैसे रस वाली कवित...