Wednesday, February 10, 2010

Madhushala (inspired by bachchan ji)

श्री हरिवंश राय बच्चन जी की मधुशाला से प्रेरणा ले कर मैंने ये पंक्तियाँ तब लिखीं थी जब मैं 10th  कक्षा में था | आज तक उनके जैसे रस वाली कवितायेँ कम ही मिल पायी  हैं |

#1
ह्रदय थाम कर खड़े थे सारे, क्या नृप, क्या सैनिक, क्या ग्वाला ;
द्वार खोल कर निकल रही थी मुस्काती कंचनबाला |
देव स्वर्ग से देख रहे थे निर्विकार उस सुन्दर को
ऋषि मुनि ताप छोड़ चुके, अब बना तपोवन मधुशाला ||

#२
आज नहीं छूना है मुझको,
मदिरालय में मद का प्याला |
हे रम्भा! मुझको अब दे दे ,
अपने तू नयनों का हाला ||
डूब मरुँ उस मद के घर में
तू मेरा उद्धार करे |
लगे सुहानी आज मृत्यु भी
मोक्ष दिला दे मधुशाला

2 comments:

  1. अत्यंत उत्कृष्ट रचना। आश्चर्य है कि आपके ब्लॉग पर पिछले छ: महिने से सन्नाटा पसरा है। लिखते रहिए! कहीं लेखनी को जंग न लग जाए।

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