Tuesday, September 9, 2014

इश्क़ से आज़ादी

आज मैं आज़ाद हूँ
आसमान के रंग को
कागज़ पे बयां करने को,
और उसमे मुझे
तुम्हारी परछाई नज़र न आएगी ।
और बागों में खिलते 
फूलों से आती खुशबुओं में
फिर तुम्हारी कभी कोई भी
खुशबु नहीं अब आएगी ।
और चाँद चाँद ही हुआ करेगा रात में
अक्स न कोई होगा तुम्हारा,
छेड़ने आया  जो होगा
फिर किसी पुरानी बात पे।

आज मैं  आज़ाद हूँ -
अब ख्यालों में तुम्हारा -
कोई  भी - छोटा- बड़ा सा,
 कैसा भी - अच्छा-बुरा सा,
कुछ भी अब न आएगा ,
और मेरे थे जो सपने खो गए थे ,
बस तुम्हारे हो गए थे ,
फिर मेरे अब हो जायेंगे  ।
और हकीकत - जो कहीं पर
छूट गयी थी
या फिर शायद रूठ गयी थी,
आज  दोबारा साथ है,
और मेरे जज़्बात हैं
फिर से मेरे ही काबू मे।







3 comments:

  1. Bful poem.. Kisi breakup ki dard se gujar rahe devdas ko ye poem padha thoda better feel kare shayed wo :P

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  2. Haha... Bilkul. Hopefully, tumko kabhi zarurat nahi padegi :)

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  3. और चाँद चाँद ही हुआ करेगा रात में
    अक्स न कोई होगा तुम्हारा--- Kya baat kya baat

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