Thursday, October 6, 2011

गरीब का बेटा

मेरी सबसे पहली कविताओं में से एक जो मैंने शायद २००२ में लिखी थी |आज के समय के हिसाब से थोड़े-बहुत  परिवर्तन किये हैं | एक मध्यम-वर्गीय लड़के कि दुविधा जो दुनिया के अमीरों को देख कर खुद को गरीब समझता है | 

गरीब का बेटा 

मैं  एक गरीब का बेटा हूँ, 
महँगे मोबाइल afford नहीं कर सकता,
इसलिए Nokia के सस्ते smartphones से काम चला रहा हूँ |
पैसों की तंगी के कारण,
Puma के जूते नहीं खरीद सकता, 
इसलिए Reebok के सस्ते जूते पहनता हूँ |
अमेरिका, यूरोप में छुट्टियां मनाना तो बस सपनों में हो सकता है,
अभी तो जैसे-तैसे मलेशिया घूम के आता हूँ |
Mercedes जैसी बड़ी कारें तो बूते के बाहर हैं,
यहाँ तो i10 जैसी छोटी कारें ही चलाने को मिलती हैं |

ये अमीर सारे,
हम गरीबों का शोषण करते हैं |
महँगी चीज़ें खरीदते हैं हमें चिढाने को 
जब हम सस्ती चीज़ों से गुज़ारा कर रहे हैं|
ये अमीर नहीं जानते 
जो मजा गरीबी में है, 
वो अमीरी में कहाँ है!
जो नशा Blender's Pride में है,
किसी Johnny Walker में कहाँ है |  
उनके कपडे भले ही Dry Clean होते होंगे
पर अपने कपड़ों कि गन्दगी के लिए -
Surf Excel है ना !

Friday, August 5, 2011

कभी कभी ख्वाबों में जब तुम आती हो,.....

कभी कभी ख्वाबों में
जब तुम आती हो,
इतने सालों के बाद भी |
कभी कभी रातों में 
जब रजनीगंधा 
खिड़की से बाँहें फैलाती है-
और हवा थपकियाँ देती है
हलके हलके से |
सन्नाटे की लोरी,
रात का राग कोई बन जाती है ,
जब तुम आती हो,
इतने सालों के बाद भी | 

ख्वाब कभी शामों के
और कभी सुबहों के |
ख्वाब कभी जन्नत के और
कभी-कभी जंगल के अंधियारों के, 
सन्नाटों के |
जहां तुम हो, मैं हूँ 
और बीच की तन्हाई हैं|

ख्वाब तो मेरे अपने पर नहीं होते हैं,
और सवेरे आँखों में जो किस्से हैं, नहीं होते हैं |
बस होती है एक सुबह सुरीली,
दिन दीवाने होते हैं,
जब तुम आती हो, 
इतने सालों के बाद भी |
कभी कभी.....

Sunday, December 5, 2010

Suraj ka Sapna

सुबह से आँख में बसता
वो सपना सूरज का .
उसी के ताप से जलता,
पिघलती मोम सी
सब पास की बेबस धराएं.
महल की काली दीवारें जलाता
आग से अपने
वो सपना सूरज का.

और एक रौशनी का है वो दरिया,
बहाता  बाढ़ में
छोटी -बड़ी
सारी निराशा,
नयी धरती बिछाता.
नए खेतों में उपजेंगे
नए दिन के नए सपने.
सुबह से आँख में बसता
वो सपना सूरज का.

Thursday, April 15, 2010

khuda-e- husn

ऐ खुदा-ए-हुस्न
तेरा आना क़यामत था |
गिरा कर बिजलियाँ सब पर
तेरा जाना क़यामत था ||

कि जुड़वाँ शोले थे सुलगे
शहर में आग फैली थी |
कि दरिया सूख ही जाता
कि ऐसी आग गहरी थी ||

ऐसी आग सुलगा कर
यूँ शर्माना क़यामत था |
और पल में चाँद से शोला
बदल जाना क़यामत था ||

कि दिन में रात को लाती
कमर तक तेरी जुल्फें थीं
अँधेरी रात से काली
नदी सी बहती जैसे थीं |

कि ऐसी जुल्फें लहरा कर
मचल आना क़यामत था |
और जादू कर कोई काला
भुला जाना क़यामत था ||

ऐ खुदा-ए- हुस्न ......

chaand

वो कहते हैं चले आओ
महीनों बीत जाने हैं
कि छत पर चाँद का आना
कभी देखा नहीं हमने |

कि परसों ईद आनी है
नहीं आने पर
किस मुँह से
हम छत पर चाँद देखेंगे |

Wednesday, February 10, 2010

Madhushala (inspired by bachchan ji)

श्री हरिवंश राय बच्चन जी की मधुशाला से प्रेरणा ले कर मैंने ये पंक्तियाँ तब लिखीं थी जब मैं 10th  कक्षा में था | आज तक उनके जैसे रस वाली कवितायेँ कम ही मिल पायी  हैं |

#1
ह्रदय थाम कर खड़े थे सारे, क्या नृप, क्या सैनिक, क्या ग्वाला ;
द्वार खोल कर निकल रही थी मुस्काती कंचनबाला |
देव स्वर्ग से देख रहे थे निर्विकार उस सुन्दर को
ऋषि मुनि ताप छोड़ चुके, अब बना तपोवन मधुशाला ||

#२
आज नहीं छूना है मुझको,
मदिरालय में मद का प्याला |
हे रम्भा! मुझको अब दे दे ,
अपने तू नयनों का हाला ||
डूब मरुँ उस मद के घर में
तू मेरा उद्धार करे |
लगे सुहानी आज मृत्यु भी
मोक्ष दिला दे मधुशाला

Pashu Prem

पशु प्रेम 


सावन के जल में
सोंधे भूतल में
हरियाली के बीच
गाड़ी को खींच
किसान खीज रहा है |
बैलों को पीट रहा है |
और तभी मेनका आती है -
किसान को खींच
वाणी से पीट
ले जाती है
और पशु अत्याचार के जुर्म में
हथकड़ी लगाती है |


पत्नी की कोरोना

साधारण खांसी बुखार  जबसे कोरोना निकल गया, मेरी पत्नी जी का तो  जैसे मौसम बदल गया | दवाई का डिब्बा, औ‌‍क्सीमीटर , थर्मोमीटर सर्वदा साथ हैं बी...